स्पंदन में आपका स्वागत है.
स्पंदन = अंतर मन में उठती हुई भावनाओं की तरंगें .जिन्हें मैं शब्द रूप देकर यहाँ उतारती हूँ.आइये और अपनी प्रतिक्रिया से मुझे अनुगृहीत कीजिये. आपकी आलोचना ,समालोचना में ही मेरी लेखनी की सफलता निहित है. आप सब का तहे दिल से शुक्रिया
tumhara jiddi wajood....tumhe auron se alag karta hai..aur yahi khasiyat hai, yahi pahchaan hai ...isko banaye rakhna...safalta ki har sidhhi pe sirf upar ki aur jana...neeche ka to sawal hi nahi:) god bless you dost:)
आपको पढना हमेशा अच्छा लगा है. समय हो तो युवतर कवयित्री संध्या की कवितायें. हमज़बान पर पढ़ें.अपनी राय देकर रचनाकार का उत्साह बढ़ाना हरगिज़ न भूलें. http://hamzabaan.blogspot.com/2011/07/blog-post_06.html
वजूद बचाने की मुहीम में ठोकर लगते रहते है .. संबल विहीन होकर भी, निज आत्मबल के सहारे दुर्धर्ष पाषाणों की पद दलित कर आगे बढ़ते जाना मनुष्य को श्रेष्ठ बनाता है
सों स्वीट!! गिरने दीजिए उस "नामुराद" को (मेरी तो जुबां से भी ना निकलता ये लफ्ज़, आपका ही है).. गिरते हैं शह सवार ही मैदाने जंग में... वैसे आपकी कविता से तो वो "तिफ्ल" (बच्चा) ही मालूम पडता है!!
गिरकर उठने का जज्बा ही सफ़लता की ओर ले जाता है। मंजिल तक पहुंचाता है।
ReplyDeleteगिरकर उठना,उठकर गिरना
जीवन की रीत पुरानी है।
आभार
जिद्दी कहीं का. ....
ReplyDelete.
बेहतरीन!!!
अच्छे से पता है , आप कितनी जिद्दी हैं :)
ReplyDeletetumhara jiddi wajood....tumhe auron se alag karta hai..aur yahi khasiyat hai, yahi pahchaan hai ...isko banaye rakhna...safalta ki har sidhhi pe sirf upar ki aur jana...neeche ka to sawal hi nahi:)
ReplyDeletegod bless you dost:)
jo ladate hain, vahi hain jeetate
ReplyDeletegirate ve chalate hain .
ye jiddipan bhee jajbaa hai
unheen se log jalate hain .
behatar post , badhai
जो करता है हठ,
ReplyDeleteचलने की पैंया पैंया
बिना थामे
उंगली किसी की.
वजूद बना उसी का
जिसने खुद
कुछ बनने की ठानी
बिना संबल लिए
बनती है नयी कहानी ...
बहुत खूबसूरत भाव लिए नन्ही सी रचना ..पर बहुत गहराई है ..
आपको पढना हमेशा अच्छा लगा है. समय हो तो युवतर कवयित्री संध्या की कवितायें. हमज़बान पर पढ़ें.अपनी राय देकर रचनाकार का उत्साह बढ़ाना हरगिज़ न भूलें.
ReplyDeletehttp://hamzabaan.blogspot.com/2011/07/blog-post_06.html
जो करता है हठ,
ReplyDeleteचलने की पैंया पैंया
बिना थामे
उंगली किसी की.
bahut sunder bhav पैंया पैंया shbdon ka prayog bahut madhur laga .
rachana
वजूद बचाने की मुहीम में ठोकर लगते रहते है .. संबल विहीन होकर भी, निज आत्मबल के सहारे दुर्धर्ष पाषाणों की पद दलित कर आगे बढ़ते जाना मनुष्य को श्रेष्ठ बनाता है
ReplyDeleteठोकर खाकर ही संभलते हैं .
ReplyDeleteयही ज़िद तो अस्तित्व की पहचान बने...
ReplyDeleteएहसासातों की खुशबू मिले भावों में...
जो एक बात बनाए,
एक संवाद भी...
जो चले वही गिरे-उठे.
ReplyDeleteबहुत खूब ...
ReplyDeleteनामुराद
ReplyDeleteजिद्दी कहीं का.
बेहतरीन..........!!
डर है मुझे
ReplyDeleteफिर ना गिर जाये कहीं
ठोकर खाकर.
ठोकरें तो इन्सान को मिलती हैं ....लेकिन जो ठोकरों से हार जाता है वह इंसान ही क्या ? हार कर उठाना और एक मुकाम पाना ही जिन्दगी है .....!
यही जिद ही नये पंथ निर्माण करती है।
ReplyDeletechoti si par bahut hi pyari.
ReplyDeleteअच्छा है
ReplyDeletebahut hathi, bahut ziddi...per bahut pyaara
ReplyDeleteसों स्वीट!!
ReplyDeleteगिरने दीजिए उस "नामुराद" को (मेरी तो जुबां से भी ना निकलता ये लफ्ज़, आपका ही है)..
गिरते हैं शह सवार ही मैदाने जंग में... वैसे आपकी कविता से तो वो "तिफ्ल" (बच्चा) ही मालूम पडता है!!
बढ़िया ज़िद है ...बनी रहे ....शुभकामनायें...!!
ReplyDeleteगिरेगा और फिर उठेगा तभी तो चलना सीखेगा |
ReplyDeleteजिद्दी कहीं का. ....
ReplyDeleteबहुत खूब...बहुत उम्दा रचना
शायद मेरा वजूद है.
ReplyDeleteजो करता है हठ,
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फिर ना गिर जाये कहीं
ठोकर खाकर.
नामुराद
जिद्दी कहीं का. ..
सुंदर भावाभिव्यक्ति,आभार.
Beautifully expressed .Loved it .
ReplyDelete:)
ReplyDeleteगिरकर चलने की जिद ही तो हमें मंज़िल तक पहुंचाती है। आपकी इस बेहतरीन प्रस्तुति अर एक शे’र अर्ज़ है ...
ReplyDeleteहो इरादों में हक़ीक़त,
हौसलों में ज़लज़ला।
आसमां झुककर तुम्हारे पांव तक आ जायेगा,
देख लेना क़िनारा, नाव तक आ जायेगा।
पैंया पैंया और जिद्दी कहीं का -शब्द प्रयोग ने सौंदर्य वृद्धि कर दी.अति-सुंदर.
ReplyDeleteयह जिद ही है जो वजूद को बनाए रखती है, वरना दुनिया तो ज़ालिम है.
ReplyDeleteअस्तित्व (वज़ूद) बड़ा कोमल होता है। वह गिरता है या नहीं समझ में नहीं आया। लेकिन आपका जिद्दी वज़ूद अच्छा लगा। आभार।
ReplyDeleteजिद है तो ज़िंदगी है...
ReplyDeleteवरना मुर्दादिल क्या ख़ाक जीते हैं...
जय हिंद...
इक क्यूट सी कविता
ReplyDeleteगिरकर संभलेगा तो बिना डरे चलना सीख लेगा ...
ReplyDeleteअपने वजूद के लिए अकेला चलना रिस्की मगर जरुरी भी !
यह ’ज़िद’ ही तो सारी ’जदें’ पार कराती है ।
ReplyDeleteबहुत खूब ...
बढ़िया कविता... बहुत सुन्दर..
ReplyDeleteबहुत प्यारी है यह जिद।
ReplyDelete------
जादुई चिकित्सा !
ब्लॉग समीक्षा की 23वीं कड़ी...।
सूनसान सी पगडण्डी पर
ReplyDeleteजो हौले हौले चलता है.
शायद मेरा वजूद है.
जो करता है हठ,
चलने की पैंया पैंया
बिना थामे
उंगली किसी की.
कोमल भावनाओं में रची-बसी खूबसूरत रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई।
Itna jididi hona bhi theek nhi,
ReplyDeleteaao thoda sa falexble ho liya jaye!
nice creation! small but deep thought!
badhai !
नामुराद
ReplyDeleteजिद्दी कहीं का.
बेहतरीन..........!!
वाह ... बहुत खूब कहा आपने ।
girte hain shay savaar hi maidane jang me chahe vo jiddi hi hon.bahut pyara likha hai Shikha.
ReplyDeleteकमाल, क्यूट...कुहू-कुहू सा करने लगा कलेजा मेरा...बधाई, असरदार रचना के लिए...!
ReplyDeleteHmmmmmmmmmm, new way to gud thought
ReplyDeleteकिसी की उंगली थामे बिना चलने की जिद सबका वजूद कहाँ करता है....
ReplyDeleteबनी रहे यह जिद....भले राह में कितनी भी ठोकरें मिले...हिम्मत न टूटे कभी...
जिद्दी कहीं का!
ReplyDelete--
अद्भुत रचना!
यही जिद तो आदमी को खास बनाती है ....
ReplyDeleteinsan ki jidd hi to sab karvati hai..bahut khoob
ReplyDeleteनामुराद
ReplyDeleteजिद्दी कहीं का
बहुत खूब
नामुराद
ReplyDeleteजिद्दी कहीं का
................कोमल भावों की सुन्दर रचना
जिद्दी कौन है? :)
ReplyDeleteगिरते हैं शहसवार ही ,मैदाने जंग में .....
ReplyDeleteये ज़िद बहुत प्यारी लगी ...
जिद्दी बनाती रचना,बहुत सुन्दर
ReplyDeleteसच है इंसान जो होता है उससे बदल कर होना बहुत मुश्किल होता है ... वजूद सच में जिद्दी होता है ...
ReplyDeletekabhi kabhi zidd achchi hoti hai !!
ReplyDeleteVisiting after a long time as I was disconnected from web.
डर है मुझे
ReplyDeleteफिर ना गिर जाये कहीं
ठोकर खाकर.
नामुराद
जिद्दी कहीं का.
...यह जिद ही तो जिंदादिल भी बनती है कभी-कभी.
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शब्द-शिखर / विश्व जनसंख्या दिवस : बेटियों की टूटती 'आस्था'
शिखा जी, आज दुबारा पढी कविता। मुझे लगता है कि यह आपकी श्रेष्ठटम रचनाओं में से एक है। एक एक शब्द गूंथा हुआ, स्वयं को सार्थक करता हुआ।
ReplyDelete------
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शायद मेरा वजूद है.
ReplyDeleteजो करता है हठ,
चलने की पैंया पैंया
बिना थामे
उंगली किसी की.
खूबसूरत रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई।
अस्वस्थता के कारण करीब 20 दिनों से ब्लॉगजगत से दूर था
ReplyDeleteआप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,
जिद्दी कहीं का
ReplyDeletebeautiful poem
आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 14-07- 2011 को यहाँ भी है
ReplyDeleteनयी पुरानी हल चल में आज- दर्द जब कागज़ पर उतर आएगा -
kya hua jo chalte-chalte lagi thokar.
ReplyDeletebharosa hain hame apne kadmo par.
bahut accha likha aapne.
पय्याँ पय्याँ. अतीत में पहुंचा दिया आपने. बहुत सुन्दर.
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